प्रेमचंद की कहानियों में अभिव्यक्ति दलित समाज
DOI:
https://doi.org/10.67275/vp605z03Keywords:
दलित अस्मिता, जाति-प्रथा और छुआछूत, स्त्री के जातिगत शोषणAbstract
प्रेमचन्द जी हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार माने जाते हैं। प्रेमचंद जी के अधिकांश रचनाएँ आम आदमी को केन्द्र में रखकर ही लिखी गई हैं। प्रेमचन्दजी ने पीड़ित शोषित-दलित पर होने वाले अत्याचारों के साक्षी रहे हैं। इसलिए उनकी कहानियों में उभरी चिन्तन की भूमि बिलकुल स्वाभाविक और हर युग में प्रासंगिक है। दलित समाज की अभिव्यक्ति प्रेमचंद ने अत्यंत, यथार्थवादी और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में अभिव्यक्त किया है ।प्रेमचंद परिस्थितियों में जनमें एवं विचारों से पोषित कथाकार थे। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से दलित वर्ग के दुख-दर्द समझाने का प्रयास किया है। ‘ठाकुर का कुंआ’, ‘सदगति’, ‘कफन’, ‘गुल्लीडंडा’, विध्वंस’, ‘मुक्तिमार्ग’, ‘मंदिर’, ‘मंत्र’, इन कहानियों के माध्यम से सदियों से शोषित, अछूत माने जाने वाले वर्ग की नारकीय स्थिति, गरीबी और जातिगत भेदभाव को उजागर किया।







