गोदान उपन्यास में चित्रित भारतीय कृषक जीवन के विविध पक्ष
##semicolon##
https://doi.org/10.67275/j3nt8h38##semicolon##
गोदान##common.commaListSeparator## प्रेमचंद##common.commaListSeparator## कृषक जीवन##common.commaListSeparator## होरी##common.commaListSeparator## ऋणग्रस्तता##common.commaListSeparator## महाजनी सभ्यता##common.commaListSeparator## सामाजिक मर्यादा##common.commaListSeparator## सामंतवाद##common.commaListSeparator## धार्मिक शोषण##common.commaListSeparator## औद्योगीकरण।सार
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'गोदान' (1936) हिंदी उपन्यास साहित्य की ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय वास्तुकला की एक ऐसी कालजयी कृति है, जो औपनिवेशिक भारत में कृषक समाज के महाविनाश की करुण गाथा को प्रामाणिकता के साथ व्यक्त करती है। यह उपन्यास भारतीय कृषक जीवन के केवल आर्थिक संकट को ही नहीं उकेड़ता, बल्कि उसके सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक पक्षों का एक अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक कोलाज प्रस्तुत करता है। प्रस्तुत शोध पत्र में 'गोदान' के केंद्रीय पात्र होरी और उसके समकालीन ग्रामीण परिवेश के माध्यम से सामंती जमींदारी व्यवस्था, औपनिवेशिक महाजनी चंगुल, धार्मिक पाखंड, और जातिवादी स्तरीकरण के बीच पिसते हुए किसान के अस्तित्व की मीमांसा की गई है। इस शोध के अंतर्गत प्रेमचंद की यथार्थवादी दृष्टि का विश्लेषण करते हुए यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार भारतीय किसान अपनी परंपराप्रियता, मर्यादा की रक्षा की ललक और गोदान की आध्यात्मिक आकांक्षा के कारण अंततः एक खेतिहर मजदूर और अंत में एक मृत देह में परिणत हो जाता है।







