विवेकी राय के कथा-साहित्य में ग्राम्य जीवन का यथार्थ और बदलता सामाजिक परिदृश्य

लेखक

  • मदन मोहन सिंह हिन्दी विभाग, अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा (मध्य-प्रदेश) ##default.groups.name.author##
  • डॉ. मंगल सिंह अहिरवार सहायक प्राध्यापक, शासकीय महाविद्यालय जयसिंह नगर, जिला – शहडोल (म.प्र.) ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.67275/vtte6d59

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विवेकी राय##common.commaListSeparator## कथा-साहित्य##common.commaListSeparator## ग्राम्य जीवन##common.commaListSeparator## सामाजिक परिदृश्य##common.commaListSeparator## यथार्थ##common.commaListSeparator## कृषक संकट##common.commaListSeparator## वर्ग-संघर्ष##common.commaListSeparator## आधुनिकीकरण##common.commaListSeparator## परंपरा और आधुनिकता

सार

हिंदी कथा-साहित्य में ग्रामीण जीवन के यथार्थ, उसकी अंतःकथाओं और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य को जिस प्रामाणिकता, गहराई और संवेदनशीलता के साथ विवेकी राय ने चित्रित किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। उनका संपूर्ण कथा-संसार—उपन्यासों और कहानियों—भारतीय ग्राम्य-संस्कृति की धड़कनों, उसके पारंपरिक मूल्यों के विघटन, आधुनिकता के प्रभाव, वर्ग-संघर्ष, जातिगत विसंगतियों और कृषक जीवन के गहरे संकटों का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने गाँव को न तो केवल आदर्श का स्थान बनाया और न ही उसे केवल समस्याओं का अड्डा दिखाया; बल्कि दोनों पक्षों को बड़ी ईमानदारी और संतुलन के साथ उकेरा है। प्रस्तुत शोध-पत्र में विवेकी राय के कथा-साहित्य के विशेष संदर्भ में ग्राम्य जीवन के यथार्थ स्वरूप तथा कालान्तर में बदलते हुए सामाजिक परिदृश्य का गहन और विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। उनके प्रमुख उपन्यासों जैसे ‘बबूल’, ‘सोमाय की वापसी’, ‘पुरुष पुराण’, ‘मंगल भवन’ और ‘लोकरिन’ के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि कैसे एक समय में स्वावलंबी, सामूहिक भावना से ओत-प्रोत और अपनी मिट्टी से गहराई से जुड़े रहने वाला ग्रामीण समाज उत्तर-स्वतंत्रता काल में राजनीतिक स्वार्थों, आर्थिक शोषण, पलायन, बाजारवाद और वैश्वीकरण के दबावों के कारण तेजी से रूपांतरित हो रहा है। भूमि-सुधारों की अधूरी प्रक्रिया, महाजनी संस्कृति का प्रसार, दलीय राजनीति का प्रवेश और शहरी आकर्षण ने गाँव की पारंपरिक संरचना को गहरी चोट पहुँचाई है। विवेकी राय ने इस बदलाव को केवल एक बाह्य संकट या सतही परिवर्तन के रूप में नहीं देखा। उन्होंने ग्रामीण मनुष्य के अंतस में मची उथल-पुथल, उसकी मानसिक द्वंद्व, मूल्य-संकट और पहचान की खोज को भी शिद्दत से रेखांकित किया है। उनके पात्र न तो पूरी तरह आदर्शवादी हैं और न ही निराशावादी; वे वास्तविक मनुष्य हैं जो परंपरा और आधुनिकता, सामूहिकता और वैयक्तिकता, श्रम की गरिमा और आर्थिक विवशता के बीच झूलते हुए दिखाई देते हैं। यह अध्ययन न केवल विवेकी राय के साहित्यिक योगदान को समझने में सहायक है, बल्कि आज के वैश्वीकृत और शहरीकृत युग में ग्रामीण भारत की जटिल वास्तविकताओं को भी बेहतर ढंग से समझने का मार्ग प्रशस्त करता है। उनका कथा-साहित्य हमें याद दिलाता है कि विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी जड़ों से कितनी दूर आ चुके हैं और उन जड़ों से जुड़े रहना कितना आवश्यक है।

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प्रकाशित

2026-06-30

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