भक्तिकालीन साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा का विस्तार एवं विश्लेषण
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https://doi.org/10.67275/t011y273##semicolon##
काव्य##common.commaListSeparator## भारतीय##common.commaListSeparator## ज्ञान##common.commaListSeparator## परंपरा##common.commaListSeparator## भक्तिकाल##common.commaListSeparator## संत काव्य##common.commaListSeparator## साहित्य##common.commaListSeparator## भक्तिकालीन##common.commaListSeparator## भक्तकवि##common.commaListSeparator## काव्य धारासार
भारतीय ज्ञान परंपरा एक विशाल नदी की तरह है जो सदियों से प्रवाहमान है। यह एक ऐसी व्यापक और समृद्ध परंपरा है जो वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यो, शास्त्रों और लोक साहित्य के माध्यम से विकसित हुई है। मध्यकाल तक आते-आते यह परंपरा संत साहित्य के रूप में जन साधारण के बीच पहुंचने लगी। संत कवियों ने समाज में धर्म, नैतिकता, प्रेम और ज्ञान का संदेश दिया। उन्होंने ज्ञान को जटिल धार्मिक अनुष्ठानों से मुक्त कर सहज, सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया। संत कवियों ने ज्ञान, भक्ति और सामाजिक सुधार को केन्द्र में रखकर साहित्य की रचना की। कबीर, तुलसी, मीराबाई, सूरदास, रैदास, गुरु नानक, नामदेव, सेना, धन्ना जैसे संतों ने लोकभाषा में अपनी रचनाएँ लिखकर इस समृध्द ज्ञान परंपरा को केवल विद्धानों तक सीमित न रखते हुए जन साधारण तक पहुंचाने का कार्य किया। भक्तिकालीन साहित्य ने जांति - पाँति, धार्मिक पाखंड और सामाजिक विषमताओं पर प्रहार करते हुए प्रेम, समानता और भारतीय एकात्मकता तथा भाईचारे का संदेश दिया। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी संत साहित्य की शिक्षाएं, उसका नैतिकतापरक दृष्टिकोण प्रासंगिक बना हुआ है।
इसी कारण भक्तिकालीन साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा की सहिष्णुता, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों को पुनः स्थापित करने में सहायक रहा है।
प्रस्तुत शोधपत्र में “भक्तिकालीन साहित्य में भारतीय ज्ञान परंपरा के विस्तार का विश्लेषण किया गया है। इस विषय के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भक्तिकालीन साहित्य में न केवल आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया गया अपितु 7सामाजिक और बौध्दिक क्रांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है।







