छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में नाचा: परंपरा से आधुनिकता तक

लेखक

  • डॉ. अपराजिता जॉय नंदी सहायक प्राध्यापक (हिंदी) श्री शंकराचार्य इंस्टिट्यूट ऑफ़ प्रोफेशनल स्टडीज, रायपुर (छत्तीसगढ़) ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.67275/SU.2026.041409

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छत्तीसगढ़##common.commaListSeparator## लोक-संस्कृति##common.commaListSeparator## नाचा##common.commaListSeparator## लोकनाट्य##common.commaListSeparator## चुनौतियाँ और संभावनाएँ

सार

छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में ‘नाचा’ को केवल एक लोकनाट्य-विधा के रूप में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के जीवंत आधार के रूप में देखता है। ‘नाचा’ सदियों से ग्राम्य जीवन, लोक-हास्य, सामाजिक चेतना और सामूहिक उल्लास का प्रमुख माध्यम रहा है, किंतु समय के साथ इसके स्वरूप और उद्देश्य में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देते हैं। यह शोध ‘नाचा’ की पारंपरिक संरचना, गुरु-चेला परंपरा, वेश-भूषा, लोक-संगीत, छत्तीसगढ़ी बोलियों की खास शैली का अध्ययन करते हुए यह भी खोजता है कि नए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों, शहरी संस्कृति और डिजिटल मंचों के प्रभाव से इसका प्रस्तुतीकरण कैसे बदलने लगा है। कहीं-कहीं यह बदलाव सहज है,तो कहीं परंपरा की मूल आत्मा को चुनौती भी देता दिखता है। इसी संदर्भ में शोध का उद्देश्य ‘नाचा’ के सांस्कृतिक आधार, उसकी सामाजिक भूमिका और बदलते समय में उसकी निरंतरता के प्रश्नों को गंभीरता से समझना है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि ‘नाचा’ के संरक्षण के लिए समुदाय,कलाकारों और नीतिगत संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी आवश्यक है। इस शोध का निष्कर्ष छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में ‘नाचा’ की केंद्रीयता को रेखांकित करते हुए इसके भविष्य स्वरूप की संभावनाओं पर प्रकाश डालता है।

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प्रकाशित

2026-06-30

अंक

खंड

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