आचार्य चतुरसेन के ‘श्रीराम’ में रस-निष्पत्ति
Abstract
भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा में 'रस' सिद्धांत का केंद्रीय स्थान है; इसके बिना नाटक और कविता की किसी भी सौंदर्यपरक व्याख्या को अधूरा माना जाता है। भरत मुनि द्वारा प्रतिपादित सूत्र—"विभावानुभावव्यभिचारिभावसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः"—न केवल नाटक की संरचना को समझने की कुंजी प्रदान करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि साहित्य का उद्देश्य केवल बाहरी यथार्थ का चित्रण करना नहीं, बल्कि भावनात्मक अनुभव का परिष्कृत संप्रेषण है (भरत मुनि 68)। आचार्य चतुरसेन द्वारा रचित नाटक 'श्रीराम' इसी परंपरा की एक ऐसी ही रचना है।







