नागार्जुन की कविता में जन चेतना सामाजिक एवं राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में
DOI:
https://doi.org/10.67275/ehgsky14Abstract
साहित्य प्रत्येक समाज का प्रतिबिंब होता है। समाज में होने वाली हर छोटी बड़ी घटना को वह बहुत ही बारीकी से देखता है फिर अपनी कलम से नई सोच के साथ उसे लिपिबद्ध करके आम जन तक भेजने का काम करता है।
साहित्य प्रत्येक युग की मनोवृति के अनुरुप होता है, वह युगानुभूतियों को सचित्र उकेरता है। साथ ही मानव को जीवन जीने की हर कटीली राहों से भिज्ञ कराता है । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह समाज से पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ होता है, किंतु कुछ ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, जिनसे जीवन जीना दूभर हो जाता है, तब धीरे से साहित्य मनुष्य होने का अर्थ बताता है और जीवन जीने का सलीका देता है।
मनुष्य वर्तमान सामाजिक मान्यताओं, कुप्रथाओं से बेहद असंतुष्ट है । बाबा नागार्जुन भी इन सामाजिक मान्यताओं, आकांक्षाओं आदर्शों व परपराओं से असंतुष्ट हैं, तभी तो वह मानव को चेतना प्रवण बनाकर स्वतंत्र जीवन जीने की सीख दे रहे हैं । उनकी कविताओं में जनता के जीवन संघर्ष राजनीतिक भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय के प्रति गहरा सरोकार दिखाई देता है
नागार्जुन की सामाजिक चेतना की पहली मुठभेड़ धर्म की जकड़ बंदी से हुई है। बाबा की जिंदगी की शुरुआत ही अभाव के आंगन से हुई, वे विषम परिस्थितियों में ब्राह्मण होकर भी ब्राह्मण नहीं हैं, बुद्ध शरणम् जाकर भी वे बौद्ध नहीं हैं। बाबा नागार्जुन अपनी कविता में लिखते हैं -







