आंतरिक पुनर्स्मरण: समकालीन जीवनशैली में चेतना के उत्कर्ष का विज्ञान

Authors

  • प्रो. सूरज प्रकाश गुप्ता आचार्य, दर्शनशास्त्र विभाग बी. आर. डी. बी. डी. पी. जी. कॉलेज आश्रम बरहज, देवरिया, उत्तर प्रदेश Author

DOI:

https://doi.org/10.67275/kmk84944

Keywords:

योग, समग्र योग, क्रियायोग, मानव चेतना, आत्म-साक्षात्कार, स्वयं से अलगाव, आधुनिक जीवनशैली, आंतरिक पुनर्स्मरण

Abstract

प्रस्तुत शोध-पत्र समकालीन जीवनशैली की विसंगतियों- मानसिक तनाव, क्षोभ (बर्नआउट) तथा ‘स्वयं से अलगाव’ के संदर्भ में मानव चेतना के उत्कर्ष का दार्शनिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को ऐसी निरंतर ‘ट्रेडमिल’ पर स्थापित कर दिया है, जहाँ बाह्य उपलब्धियों की दौड़ के बावजूद आंतरिक संतोष का अभाव बना रहता है। इस समस्या के समाधान हेतु शोध में श्री अरविन्द के ‘समग्र योग’ और परमहंस योगानंद के ‘क्रियायोग’ का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। जहाँ समग्र योग ‘अतिमानस’ के अवतरण द्वारा चेतना के रूपांतरण पर बल देता है, वहीं क्रियायोग प्राण-शक्ति के वैज्ञानिक नियंत्रण के माध्यम से शरीर-मन के ‘आंतरिक स्विचबोर्ड’ को संतुलित करने की प्रक्रिया प्रस्तुत करता है। शोध-पत्र यह प्रस्तुत करता है कि आधुनिक मानसिक अशांति का मूल कारण किसी बाह्य वस्तु का अभाव नहीं, बल्कि ‘स्वयं से दूरी’ है। अतः समाधान बाह्य संसाधनों में नहीं, बल्कि ऊर्जा के अंतर्मुखी प्रवाह और आत्म-स्मृति ; (Recollection)  में निहित है। प्रदत्त अध्ययन द्वारा यह भी स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए संसार का त्याग आवश्यक नहीं, बल्कि चेतना का आंतरिक रूपांतरण अपेक्षित है। अंततः, ‘खंडित’ दृष्टि से ‘समग्र’ दृष्टि की ओर यह यात्रा व्यक्तिगत शांति को वैश्विक कल्याण में रूपांतरित करने की क्षमता रखती है।

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Published

2026-06-30

How to Cite

आंतरिक पुनर्स्मरण: समकालीन जीवनशैली में चेतना के उत्कर्ष का विज्ञान. (2026). Shodh Utkarsh, 4(14), 96-99. https://doi.org/10.67275/kmk84944

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