रणेन्द्र के उपन्यास ‘गायब होता देश’ में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-संघर्ष

Authors

  • जय कुमार तिवारी शोधार्धी, हिंदी विभाग इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक म.प्र. Author

DOI:

https://doi.org/10.67275/SU.2026.041407

Keywords:

मूलनिवासी, घरवापसी, भूमण्डलीकरण, यथार्थ, विस्थापन, बेरोजगारी, जादुई यथार्थवाद, नवसाम्राज्यवादी लूट

Abstract

रणेन्द्र एक उभरते हुए उपन्यासकार हैं, इन्होने अपने उपन्यासों के माध्यम से आदिवासी जीवन के विविध पक्षों  को प्रस्तुत किया है। आदिवासी समाज से जुड़कर उनके दर्शन, जीवन-संघर्ष तथा समस्याओं को पाठकों तक पहुंचाते हैं। रणेन्द्र का उपन्यास गायब होता देश में झारखण्ड की मुण्डा जनजाति  के जीवन दर्शन तथा जीवन संघर्षों का चित्रण है। इस जनजातीय समाज की मूल समस्या विस्थापन है। विस्थापन के बाद किसी भी समाज के लिए नए जगह में पुनः ढलना कठिन होता है। उनकी पूरी संस्कृति के विलुप्त होने का खतरा रहता है। भूमण्डलीकरण के नाम पर आदिवासियों की संस्कृति तथा समाज की अंत किया जा रहा है। ‘गायब होता देश’ शीर्षक भी आदिवासियों की इस समस्या को चरितार्थ करती है। आदिवासियों के विरोध को शासन के प्रत्येक स्तर पर दबा दिया जाता है, उनको उनकी ही संपत्ति जल, जंगल और जमीन से बेदखल कर दिया जाता है। आदिम समाज की यह तमाम समस्या रणेंद्र के इस उपन्यास मे चित्रित है।

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Published

2026-06-30

How to Cite

रणेन्द्र के उपन्यास ‘गायब होता देश’ में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन-संघर्ष. (2026). Shodh Utkarsh, 4(14), 28-31. https://doi.org/10.67275/SU.2026.041407

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