सूर्यबाला के ‘मेरे संधिपत्र’ उपन्यास में स्त्री स्वत्व की विश्लेषण
Abstract
सूर्यबाला का उपन्यास *मेरे संधिपत्र* समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री-चेतना की विकसित होती धारा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। हिंदी साहित्य के विकासक्रम में कथा-साहित्य में महिलाओं का जीवन लगातार एक केंद्रीय विषय रहा है। हालाँकि, स्वतंत्रता-पश्चात काल में—विशेषकर 1960 के बाद—हिंदी उपन्यासों में एक नई प्रवृत्ति उभरी जिसने स्त्री के 'स्व' को केंद्र में रखा। वह अब केवल पीड़िता या आत्म-बलिदान की प्रतिमूर्ति नहीं रही; बल्कि वह अपने अस्तित्व, अधिकारों और आत्म-सम्मान के प्रति पूरी तरह जागरूक एक व्यक्ति के रूप में उभरी। इसी ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में सूर्यबाला के *मेरे संधिपत्र* का विशेष महत्व है।







