धूमिल की पटकथा: लोकतंत्र की विडंबना और जनचेतना का दस्तावेज

Authors

  • डॉ. मुक्तारानी कंचकार Author

Abstract

धूमिल अपनी कविताओं के ज़रिए आज़ादी की लड़ाई के आदर्शों से उपजी निराशा को व्यक्त करते हैं; जहाँ एक समय "आज़ादी" शब्द के ज़िक्र मात्र से ही समाज में ऊर्जा और उत्साह की लहर दौड़ जाती थी, वहीं राजनीति की कठोर सच्चाइयों ने लोकतंत्र, त्याग, स्वतंत्रता, संस्कृति, शांति और मानवता जैसे मूल्यों को खोखला बना दिया है।
राजनीतिक एकरूपता, झूठे वादे और नेकी का दिखावा करने वाले धोखे ने घोर निराशा की स्थिति पैदा कर दी है—एक ऐसी स्थिति जिसे इस तरह बयां किया जा सकता है...

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Published

2025-12-31

How to Cite

धूमिल की पटकथा: लोकतंत्र की विडंबना और जनचेतना का दस्तावेज . (2025). Shodh Utkarsh, 3(12), 96-97. https://shodhutkarsh.com/index.php/s/article/view/354