संत कबीर और तुलसी के श्रीराम

लेखक

  • रमेश प्रसाद पटेल & डॉ. अमित शुक्ला ##default.groups.name.author##

सार

इंसान अपने अंदर एक और तरह की दौलत खोजता है—यह यकीन कि "हम उनसे ऊपर हैं।" ऐसी ही सोच होती है।
अक्सर, हिंदी में दलित साहित्य की बुराई यह की जाती है कि यह बगावत की आवाज़ है; यह निराशा में डूबा हुआ है, इसमें कोई उम्मीद नहीं दिखती; और यह असल में दबे-कुचले लोगों की आवाज़ है।

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प्रकाशित

2023-12-31

अंक

खंड

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