अकाल में उत्सव- समकालीन भारतीय ग्रामीण समाज का प्रतिरूप

लेखक

  • प्रो.प्रिया ##default.groups.name.author##

सार

भारतीय किसान कभी सच में तरक्की नहीं कर पाए, न ही वे आगे बढ़ पाए हैं। असल में, हालात बहुत बुरे हैं। देश तेज़ी से तरक्की कर रहा है और अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों से सबका मान बढ़ा रहा है; फिर भी, भारत माता के किसान गरीबी और अधिकारियों की शोषणकारी चालों में फँसे हुए हैं। यह एक ऐसा मामला है जिस पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है। यह कब तक चलता रहेगा? आख़िरकार, हम *गोदान*—और *फाँसा* जैसी दूसरी रचनाएँ—उसी सोच के साथ पढ़ते हैं जो उन्हें लिखते समय थी। इसका मतलब है कि शायद हम गलत रास्ते पर जा रहे हैं।

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प्रकाशित

2026-03-31

अंक

खंड

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