'भोलाराम का जीव' में निहित प्रशासनिक भ्रष्टाचार और सामाजिक विसंगति का आलोचनात्मक विश्लेषण
सार
यह रिसर्च पेपर मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की कालजयी रचना 'भोलाराम का जीव' के ज़रिए आज की प्रशासनिक व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और संवेदनशीलता की कमी का विश्लेषण करता है। यह अध्ययन इस बात पर रोशनी डालता है कि कैसे सरकारी तंत्र की पेचीदगियों में उलझकर एक आम नागरिक का अस्तित्व ही खत्म हो जाता है।







