सामाजिक असमानता की उपभोक्ता मुस्लिम महिलाओं की त्रासदी: ‘अकेला पलाश’

लेखक

  • प्रोफेसर डॉ. एकलरे चंद्रकांत नरसप्पा सहायक प्रोफेसर और अनुसंधान निदेशक महात्मा ज्योक्ताबा फुले महक्तविद्यालय, मुखु रेड टी.मुखु रेड जी.नांदेड़ महाराष्ट्र ##default.groups.name.author##

सार

साहित्य समाज का प्रतिबिंब बन जाता है। यह समाज को सही परिप्रेक्ष्य से बदलने में सहायक होता है। साहित्य के माध्यम से पुराना समाज अपनी स्वतंत्रता खोने लगता है। वर्तमान समय में, साहित्य ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जिससे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और अंधकारमय वर्गों के लोग भयभीत होने लगे हैं। समाज का विश्वास खोना और ऋषि की शक्ति का पतन शायद अंतिम चरण में है।

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प्रकाशित

2023-09-30

अंक

खंड

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