नयी कविता में आक्रोश और विडंबना की सौन्दर्यात्मक अभिव्यक्ति: श्रीकांत वर्मा के काव्य के विशेष सन्दर्भ में
##semicolon##
https://doi.org/10.67275/ztqqym18##semicolon##
आधुनिकता##common.commaListSeparator## सत्ता##common.commaListSeparator## इतिहास##common.commaListSeparator## राजनीतिक- विडंबना##common.commaListSeparator## मध्यवर्गीय##common.commaListSeparator## आक्रोश।सार
हिंदी की नई कविता आधुनिक भारतीय जीवन की जटिल सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और अस्तित्वगत परिस्थितियों से निर्मित एक महत्त्वपूर्ण काव्यधारा है। बीसवीं शताब्दी के मध्य में बदलते सामाजिक यथार्थ, युद्ध-बोध, औद्योगीकरण, नगरीकरण, राजनीतिक अस्थिरता, मूल्य-संकट और व्यक्ति के बढ़ते अकेलेपन ने कविता की संवेदना और अभिव्यक्ति को व्यापक रूप से प्रभावित किया। नई कविता ने परंपरागत भावुकता और सामूहिक आदर्शवाद से अलग व्यक्ति के निजी अनुभव, अंतर्द्वंद्व, विसंगति, असुरक्षा और अस्तित्वगत प्रश्नों को काव्य के केंद्र में स्थापित किया। इस प्रक्रिया में आक्रोश, विडंबना, व्यंग्य, प्रश्नाकुलता और प्रतिरोध इसकी प्रमुख अभिव्यक्तिगत विशेषताएँ बनकर उभरीं।
इसी संदर्भ में श्रीकांत वर्मा का काव्य नई कविता की आधुनिक चेतना का विशिष्ट प्रतिनिधित्व करता है। उनकी कविताओं में व्यक्ति और समाज, सत्ता और मनुष्य, इतिहास और वर्तमान तथा मिथक और यथार्थ के बीच विद्यमान तनाव का गहन एवं आलोचनात्मक उद्घाटन मिलता है। उनका आक्रोश प्रत्यक्ष राजनीतिक विरोध तक सीमित न रहकर सामाजिक पाखंड, नैतिक अवमूल्यन, आत्मिक क्षरण और ऐतिहासिक विसंगतियों के प्रति भी अभिव्यक्त होता है। विशेषतः ‘मगध’ में इतिहास के पुनर्पाठ के माध्यम से समकालीन सत्ता-संरचनाओं, राजनीतिक विडंबनाओं और मनुष्य की असुरक्षा को प्रतीकात्मक एवं व्यंजना-प्रधान भाषा में अभिव्यक्ति प्राप्त होती है। प्रस्तुत अध्ययन का उद्देश्य नई कविता की संवेदनात्मक एवं सौंदर्यात्मक संरचना के संदर्भ में श्रीकांत वर्मा के काव्य में निहित आक्रोश और विडंबना-बोध का विश्लेषण करना तथा उसके ऐतिहासिक, राजनीतिक और अस्तित्ववादी आयामों को रेखांकित करना है।







