भारतीय ज्ञान परम्परा के निर्माण में संत कवयित्री लल्लेश्वरी का योगदान
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https://doi.org/10.67275/40bshy85##semicolon##
भारतीय ज्ञान परम्परा##common.commaListSeparator## लल्लेश्वरी##common.commaListSeparator## ललद्यद##common.commaListSeparator## वाख##common.commaListSeparator## कश्मीर शैवदर्शन##common.commaListSeparator## संत साहित्य##common.commaListSeparator## आत्मज्ञान##common.commaListSeparator## स्त्री चेतनासार
भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की सबसे प्राचीन एवं समृद्ध ज्ञान-परम्पराओं में से एक है। इसकी आधारशिला वेद, उपनिषद्, आगम, पुराण, बौद्ध, जैन तथा भक्ति परम्परा में निहित है। इस परम्परा का मूल उद्देश्य मनुष्य के बाह्य एवं आंतरिक विकास के माध्यम से आत्मबोध, लोककल्याण और विश्वबंधुत्व की स्थापना करना रहा है। मध्यकालीन संत साहित्य ने इस ज्ञान परम्परा को जनसामान्य तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस संदर्भ में कश्मीर की महान संत कवयित्री लल्लेश्वरी (ललद्यद) का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय है। लल्लेश्वरी ने अपने अनुभवजन्य आध्यात्मिक ज्ञान को सरल लोकभाषा में व्यक्त किया। उनके 'वाख' केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं हैं, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा के मूलतत्त्व आत्मज्ञान, अद्वैत, मानवतावाद, गुरु- परम्परा, आत्मानुभूति तथा धार्मिक समन्वय के सशक्त प्रतिपादक हैं। उन्होंने बाह्य आडंबर, कर्मकाण्ड, जाति-पाँति तथा संकीर्ण धार्मिक मान्यताओं का विरोध करते हुए आत्मानुभूति को मोक्ष का वास्तविक मार्ग बताया। इस प्रकार लल्लेश्वरी की वाणी भारतीय ज्ञान परम्परा को लोकजीवन से जोड़ने वाली एक महत्त्वपूर्ण कड़ी सिद्ध होती हैं। उनके वाखों में ज्ञान को केवल शास्त्रीय या बौद्धिक उपलब्धि न मानकर जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव और आत्मबोध से जोड़ा गया है। उन्होंने बाह्य आडंबर, रूढ़ियों और धार्मिक भेदभाव के स्थान पर अंतःशुद्धि, आत्मसंयम और सहिष्णुता को महत्त्व दिया। उनकी दृष्टि में परम सत्य मनुष्य के भीतर विद्यमान है; इसलिए जाति, धर्म, लिंग और सामाजिक भेद मनुष्य की वास्तविक पहचान नहीं हो सकते।







