महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान के काव्य में भारतीय ज्ञान परम्परा की झलक

लेखक

  • जयश्री सिंह शोधार्थी हिंदी विभाग, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल ##default.groups.name.author##
  • डॉ. अनुपमा वंदना सहायक प्राध्यापक एवं शोध निर्देशिका हिंदी विभाग, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.67275/SU.2026.041419

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आध्यात्मिकता##common.commaListSeparator## बहुआयामी##common.commaListSeparator## समृद्ध##common.commaListSeparator## सांस्कृतिक चेतना

सार

भारतीय ज्ञान परम्परा विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी परम्पराओं में से एक है। यह केवल धार्मिक या आध्यात्मिक विचारों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के समस्त पक्षों — सामाजिक, नैतिक, सांस्कृतिक, दार्शनिक, शैक्षिक और मानवीय मूल्यों — को अपने भीतर समाहित करती है। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, बौद्ध और जैन दर्शन, लोक परंपराएँ तथा भारतीय साहित्य इस ज्ञान परंपरा के प्रमुख आधार हैं।

भारतीय संस्कृति एक गहन महासागर है, जिसका मंथन करके साहित्य और विचार दोनों प्रकाशमान होते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा की विशेषता यह है कि यहाँ विभिन्न मतों और विचारों को समान रूप से स्थान दिया गया है। एक ओर उपनिषदों का आध्यात्मिक चिंतन है, तो दूसरी ओर चार्वाक दर्शन का भौतिकवादी दृष्टिकोण भी स्वीकार किया गया है। यह विविधता भारतीय ज्ञान परंपरा को अद्वितीय बनाती है।

आधुनिक हिंदी साहित्य में अनेक कवियों ने भारतीय ज्ञान परम्परा के मूल तत्वों को अपने साहित्य में अभिव्यक्त किया है। महादेवी वर्मा और सुभद्रा कुमारी चौहान ऐसी ही दो महत्वपूर्ण कवयित्रियाँ हैं, जिनके काव्य में भारतीय सांस्कृतिक चेतना, नारी शक्ति, करुणा, त्याग, संघर्ष और आध्यात्मिकता के विविध स्वर दिखाई देते हैं।

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प्रकाशित

2026-06-30

अंक

खंड

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