पुरुषार्थ चतुष्टय का पारस्परिक समन्वय शांतिपर्व के विशेष संदर्भ में

लेखक

  • कैलाशचंद ##default.groups.name.author##
  • डॉ. हरिओम ##default.groups.name.author##

सार

भारतीय ऋषियों के दार्शनिक चिंतन का मूल आधार मानवीय जीवन को शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उन्नत बनाना था। इन विचारकों ने सुख की अवधारणा को दो श्रेणियों में विभाजित किया। पहली श्रेणी का सुख क्षणभंगुर, अस्थिर और भ्रमपूर्ण होता है; यह शारीरिक आवश्यकताओं और इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त होने वाला सांसारिक सुख है। हालाँकि, इस प्रकार के सुख में संकीर्णता और स्वार्थ की भावना होती है और यह जीवन को तृष्णाओं और कामुक वासनाओं से बांधता है—ऐसे गुण जो एक आदर्श जीवन का आधार नहीं बन सकते।

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प्रकाशित

2025-12-31

अंक

खंड

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