समकालीन कथा साहित्य में वंचित समाज का विमर्श
सार
आज के हिंदी कथा-साहित्य में—जिसमें लघु कथाएँ और उपन्यास दोनों शामिल हैं—हाशिए पर रहने वाले समुदायों से जुड़ी चर्चा ने एक नई तरह की क्रांति को जन्म दिया है। यह क्रांति जाति-आधारित उत्पीड़न, सामाजिक अन्याय और अपनी पहचान की खोज जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। इस आंदोलन को 1980 के दशक में काफी गति मिली, जब हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लेखकों ने अपने कड़वे जीवन-अनुभवों को कहानियों का रूप देना शुरू किया और इस तरह ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर प्रहार किया। यह लेख हाशिए पर रहने वाले समुदायों से जुड़ी इस चर्चा की ऐतिहासिक जड़ों की पड़ताल करता है...







