लोक साहित्य तथा शिष्ट साहित्य का स्वरूप

लेखक

  • प्रो. कविता त्यागी ##default.groups.name.author##

सार

लोक-जीवन के महत्व को प्राचीन काल से ही स्वीकार किया गया है। वैदिक परंपरा के नियमों और निषेधों के साथ-साथ लोक-रीति-रिवाजों की एक धारा भी निरंतर बहती रही है। हालाँकि, लोक-साहित्य में 'लोक' शब्द का प्रयोग ठीक उसी अर्थ में नहीं किया जाता है जैसा ऐतिहासिक रूप से होता रहा है; आज यह शब्द निश्चित रूप से आम लोगों के जीवन और उनकी पारंपरिक रीति-रिवाजों की ओर संकेत करता है।

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प्रकाशित

2025-06-30

अंक

खंड

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