प्रेमचन्द के साहित्य में वृद्ध विमर्श

लेखक

  • प्रियांशु कुमारी & डॉ. सरिता सिन्हा ##default.groups.name.author##

सार

बुढ़ापा एक ऐसा दौर है जिसमें प्यार, स्नेह और सम्मान के ज़रिए ही सही देखभाल की जा सकती है। जब यह दौर खत्म होने वाला होता है, तो अक्सर बुज़ुर्ग कमज़ोर और थके हुए हो जाते हैं। ऐसे समय में, उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो उन्हें सहारा दे सके और अपनापन महसूस करा सके। ज़िंदगी के इस आखिरी पड़ाव पर बहुत कम लोगों को अपने अपनों का साथ मिल पाता है या कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है जिसके साथ वे अपना दुख-दर्द बांट सकें। आम तौर पर, 60 साल की उम्र से लेकर मौत तक के समय को बुढ़ापा माना जाता है; इंसानी ज़िंदगी का यह ढलान वाला दौर अक्सर एक मुश्किल सफ़र होता है।

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प्रकाशित

2024-12-31

अंक

खंड

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