हिंदी उपन्यासों में उत्तर आधुनिकता विमर्श

लेखक

  • प्रा.जयवंत मधुकर बाबर ##default.groups.name.author##

सार

पश्चिमी देशों ने 'पोस्ट-मॉडर्निटी' (उत्तर-आधुनिकता) की सोच को प्रभावित किया है। इस विचारधारा के कारण नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है; आज लोग भौतिकवाद के पीछे भाग रहे हैं। आजकल इंसानियत कम हो रही है और अमानवीयता बढ़ रही है। लोग उपभोगवादी संस्कृति को अपना रहे हैं, और इस चलन का युवा पीढ़ी पर गहरा असर पड़ रहा है। समाज में यौन संबंधों को लेकर खुलापन बढ़ रहा है, साथ ही आपसी रिश्तों में बनावटीपन भी आ रहा है। इससे मानवीय संवेदनाएं खत्म हो रही हैं—और हिंदी उपन्यासकारों ने इसी विषय को दिखाने की कोशिश की है।

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प्रकाशित

2024-12-31

अंक

खंड

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