हिंदी साहित्य में समाज का विमर्श : समकालीन संदर्भ में एक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.67275/4xe6pz89Keywords:
हिंदी साहित्य, समाज, सामाजिक विमर्श, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, सामाजिक न्याय, समकालीन साहित्यAbstract
हिंदी साहित्य भारतीय समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन का सशक्त प्रतिबिंब रहा है। साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि वह समाज की चेतना, संघर्ष, आकांक्षाओं और परिवर्तनशील मूल्यों को अभिव्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है। हिंदी साहित्य के विकासक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों—स्त्री, दलित, आदिवासी, किसान, श्रमिक, वंचित, अल्पसंख्यक तथा ग्रामीण और निम्न-मध्यवर्गीय समाज—के जीवन-संघर्षों को निरंतर साहित्यिक अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है।
प्रस्तुत शोध-पत्र में हिंदी साहित्य में सामाजिक विमर्श की परंपरा तथा उसके समकालीन स्वरूप का अध्ययन किया गया है। विशेष रूप से वर्ष 2022 से 2026 तक के समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श, सामाजिक न्याय, ग्रामीण जीवन, पर्यावरण, विस्थापन, डिजिटल संस्कृति और मानवीय संवेदना जैसे विषयों का विश्लेषण किया गया है। साहित्य अकादेमी भी भारतीय साहित्य के अध्ययन में विभिन्न सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों और उनके साहित्यिक प्रभावों को महत्त्व देती है।
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समकालीन हिंदी साहित्य में समाज केवल पृष्ठभूमि नहीं है, बल्कि वह रचना का सक्रिय और केंद्रीय विषय बन गया है। साहित्य सामाजिक यथार्थ को प्रस्तुत करने के साथ-साथ सामाजिक चेतना और परिवर्तन की संभावनाओं को भी जन्म देता है।







