आत्मबोध, मानसिक शान्ति एवं जीवन-दृष्टि के सन्दर्भ में अद्वैत वेदान्त की उपादेयता
DOI:
https://doi.org/10.67275/jjgrz284Keywords:
ज्ञमलूवतकेद्धरू आत्मबोध, मानसिक शान्ति, साधन-चतुष्टय, श्रवण, मनन, निदिध्यासन, जीवन-दृष्टि, आत्म-साक्षात्कारAbstract
वर्तमान सूचना-प्रधान एवं तीव्र परिवर्तनशील सामाजिक परिवेश में मानसिक अशान्ति, अस्तित्वगत असुरक्षा तथा जीवन के वास्तविक उद्देश्य के प्रति उत्पन्न भ्रम मानव जीवन की प्रमुख चुनौतियों के रूप में उभर रहे हैं। इस शोध-पत्र में इन समस्याओं के समाधान के संदर्भ में आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त की दार्शनिक उपादेयता का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि अद्वैत वेदान्त केवल सैद्धान्तिक दर्शन न होकर आत्मबोध, मानसिक शान्ति तथा सम्यक् जीवन-दृष्टि की एक व्यावहारिक ज्ञान-परम्परा है। शोध पत्र में अद्वैत वेदान्त के मूल सिद्धान्तों- अविद्या, ब्रह्म-आत्म ऐक्य, साधन-चतुष्टय, श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन का दार्शनिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। यह प्रतिपादित किया गया है कि मानव के दुःख, बन्धन तथा मानसिक अशान्ति का मूल कारण बाह्य परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप के प्रति अज्ञान एवं मिथ्या आरोपण है। अतः आत्मज्ञान के माध्यम से ही स्थायी शान्ति, आन्तरिक संतुलन तथा वास्तविक स्वतंत्रता की प्राप्ति सम्भव है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि साधन-चतुष्टय के माध्यम से साधक के अन्तःकरण का परिष्कार होता है, जबकि श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन आत्म-साक्षात्कार की क्रमिक प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं। अद्वैत वेदान्त संसार-त्याग का उपदेश नहीं देता, बल्कि संसार में रहते हुए विवेक, वैराग्य, मानसिक अनुशासन तथा आत्मबोध के आधार पर संतुलित एवं सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा प्रदान करता है।







