औपनिवेशिक दौर में भाषा-संबंधी विमर्श और भारतेन्दु हरिश्चंद्र
DOI:
https://doi.org/10.67275/mz7man43Keywords:
उपनिवेश, भाषा विमर्श, बाइबिल, आर्य समाज, निज भाषाAbstract
औपनिवेशिक काल में हिंदी भाषा से संबंधित विमर्श और उसके जातीय स्वरूप के निर्माण में अनेक ऐतिहासिक घटनाओं, संस्थाओं तथा प्रमुख व्यक्तित्वों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इस भाषायी विमर्श को दिशा देने वाले प्रमुख चिंतकों और साहित्यकारों में राजा लक्ष्मण सिंह, सर सैयद अहमद ख़ाँ, राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’, भारतेन्दु हरिश्चंद्र और उनके मंडल का विशेष स्थान है। इन व्यक्तित्वों ने भाषा, लिपि, शिक्षा, साहित्य और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े प्रश्नों पर अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए, जिनसे हिंदी-उर्दू विवाद तथा हिंदी के स्वतंत्र भाषायी स्वरूप के निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित हुई। इनमें भारतेन्दु हरिश्चंद्र की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। उन्होंने अपने साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से हिंदी भाषा के विकास, प्रसार और प्रतिष्ठा के लिए सक्रिय प्रयास किए। वे मातृभाषा को सामाजिक उन्नति, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक आत्मबोध का प्रमुख आधार मानते थे। ‘निज भाषा’ के प्रति उनका आग्रह केवल भाषायी शुद्धता तक सीमित नहीं था, बल्कि वह औपनिवेशिक शासन के बीच भारतीय समाज की अस्मिता, स्वाभिमान और आधुनिक चेतना के निर्माण से भी जुड़ा हुआ था। प्रस्तुत आलेख में औपनिवेशिक दौर के भाषा-संबंधी विमर्श की पृष्ठभूमि का विश्लेषण करते हुए भारतेन्दु हरिश्चंद्र की भाषायी दृष्टि, साहित्यिक भूमिका और हिंदी के जातीय स्वरूप के निर्माण में उनके योगदान का अध्ययन किया गया है।







