'गोली' उपन्यास में पुरुष पात्रों की मनोवैज्ञानिक दुर्बलता और हताशा का चित्रण
Abstract
आचार्य चतुरसेन शास्त्री (1891–1960) हिंदी के एक प्रमुख ऐतिहासिक उपन्यासकार थे, जिनकी रचनाएँ अपने यथार्थवादी दृष्टिकोण और मनोवैज्ञानिक गहराई के लिए जानी जाती हैं। उनका उपन्यास *वयाली* (1958) राजपूत रियासतों के *अंतःपुर* (भीतरी कक्षों) की कठोर और बिना किसी लाग-लपेट के दिखाई गई सच्चाई का मर्मस्पर्शी चित्रण करता है।







