मीरा की भक्ति परक विरहानुभूति

Authors

  • डॉ. रमेश कुमार कोरी अतिथि प्राध्यापक Author

DOI:

https://doi.org/10.67275/cqxn2m93

Abstract

प्रिय मिलन की व्यवधान दशा में मनुष्य के हृदय में जो वेदना उद्भूत होती है, उसे सभी प्रेमी हृदय समझते हैं। मिलना बिछुड़ना जगत गति है। प्रेम की प्रारम्भिक स्थिति से ही प्रिय की समीपता की तीव्र भावना उत्पन्न होने लगती है। जब प्रेम की प्रारम्भिक शुरूआत होती है। तब दोनों नायक-नायिका में व्याकुलता वर्तमान रहती है। किन्तु मिलन के पश्चात जिस विरहानुभूति का जन्म लेता है। वह मिलन के अनुभवों से गहरा संबंध होने का कारण अधिक दुखदायी होता है। मिलन की अनुभूतियों की तीव्रता वियोग काल में घातक स्थिति तक पहुँच जाती है। संयोग के समय जो उपादात सुखकर होते हैं, वे विप्रलंभ की स्थिति में बैरी के रूप में दिखने लगते हैं, यहाँ तक की सहज बातें भी उल्टी प्रतीत होने लगती हैं। हमारे संस्कृत के विशाल वांग्मय में ऐसे वियोग की पर्याप्त चर्चा हुई है। जयदेव से लेकर विद्यापति, सूर, बिहारी और छायावादी कवियों तक में ऐसा विरह का चित्रण और अंकन होता आया है। विरह स्वयं में दुखदायी है। दुख की तमाम स्थितियाँ इसकी व्याप्ति में आती हैं। शास्त्रकारों ने विरह की विभिन्न परिस्थितियों की चर्चायें की हैं। कोई जरूरी नहीं कि किसी एक विरही को तमाम परिस्थितियाँ तय करनी पड़ती हैं किन्तु जिसमें जितनी संवेदनशीलता की मात्रा होगी, उस स्थिति तक उसे तय करना पड़ सकता है।

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Published

2026-09-30

How to Cite

मीरा की भक्ति परक विरहानुभूति. (2026). Shodh Utkarsh, 4(15), 73-74. https://doi.org/10.67275/cqxn2m93