सूरदास कृत 'भ्रमरगीत सार' में उपालंभ काव्य एवं वात्सल्य वर्णन का आलोचनात्मक अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.67275/z8sza843Keywords:
सूरदास, भ्रमरगीत सार, उपालंभ काव्य, वात्सल्य वर्णन, विरह-वेदना, गोपियाँ, कृष्ण, यशोदा, भक्ति काव्य, सगुण भक्ति, माधुर्य भाव, वात्सल्य रस, श्रृंगार रस, वियोग श्रृंगार, लोक-संवेदना, मनोवैज्ञानिक चित्रण, भावाभिव्यक्ति, काव्य-सौंदर्य, ब्रजभाषा, सूर काव्यAbstract
हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग (भक्ति काल) की सगुण कृष्णभक्ति धारा के शिरोमणि महाकवि सूरदास (1478–1583 ई.) का साहित्य भारतीय रागात्मक चेतना का अक्षय कोष है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित 'भ्रमरगीत सार' सूरसागर का वह हृदय-स्थल है जहाँ सगुण भक्ति और निर्गुण ज्ञान, लोक-संवेदना और दार्शनिकता, तथा वक्रोक्ति और भावुकता का अभूतपूर्व द्वंद्व एवं समन्वय घटित होता है। प्रस्तुत विस्तृत 7-पृष्ठीय शोध-पत्र में 'भ्रमरगीत सार' के दो सबसे महत्त्वपूर्ण आधार-स्तंभों—'उपालंभ काव्य' (व्यंग्य व उलाहना) तथा 'वात्सल्य वर्णन' (विशेषकर विरह-वात्सल्य) का आलोचनात्मक एवं शास्त्रीय अनुशीलन प्रस्तुत किया गया है।
इस शोध-पत्र में यह विश्लेषित किया गया है कि किस प्रकार गोपियों की वाग्विदग्धता, व्यंग्य-शैली और उपालंभ-विधान ने महाज्ञानी उद्धव के निर्गुण योगमार्ग को परास्त कर लोक-जीवन की निष्काम प्रेमभक्ति की स्थापना की। साथ ही, कृष्ण के मथुरा गमन के उपरांत माता यशोदा एवं नंद बाबा के विरह-वात्सल्य के माध्यम से वात्सल्य रस के उस मर्मस्पर्शी स्वरूप को उद्घाटित किया गया है जो विश्व साहित्य में अप्रतिम है। शोध-पत्र की अकादमिक प्रामाणिकता हेतु आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेंद्र, डॉ. रामकुमार वर्मा, डॉ. मुंशीराम शर्मा एवं डॉ. मैनेजर पांडेय की प्रतिष्ठित आलोचनात्मक कृतियों से संख्यांकित एवं पृष्ठ संख्या सहित संदर्भ अंत में तालिका तथा पाठगत रूप में उद्धृत किए गए हैं।







