पारंपरिक भारतीय ज्ञान-परंपरा और सतत विकास

Authors

  • डॉ. ज्योति खातरकर सहायक प्राध्यापक, इतिहास शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल Author

DOI:

https://doi.org/10.67275/t8vb2f34

Abstract

यह शोध-पत्र इस बात को समझाने की कोशिश करता है कि आजकल जिसे हम "सतत विकास" कहते हैं, वह सोच भारत में बिल्कुल नई नहीं है। आमतौर पर माना जाता है कि सतत विकास बीसवीं सदी की देन है, खासकर सन 1987 की ब्रंटलैंड रिपोर्ट के बाद यह शब्द ज्यादा चर्चा में आया। लेकिन जब हम भारतीय इतिहास को ध्यान से देखते हैं, तो पता चलता है कि संसाधनों को सोच-समझकर इस्तेमाल करना, समाज में सबकी भागीदारी रखना, जरूरत भर उपयोग करना और आने वाली पीढ़ियों का ख्याल रखना ये सारी बातें भारतीय सभ्यता में हजारों साल पहले से मौजूद थीं। इस शोध में सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर वैदिक काल, मौर्य-गुप्त काल, मध्यकालीन भारत, अंग्रेजों के शासन काल और आज के स्वतंत्र भारत तक का ऐतिहासिक अध्ययन किया गया है, ताकि यह समझा जा सके कि हमारी पुरानी ज्ञान-परंपरा आज के सतत विकास लक्ष्यों यानी SDGs से किस तरह जुड़ती है।

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Published

2026-09-30

How to Cite

पारंपरिक भारतीय ज्ञान-परंपरा और सतत विकास. (2026). Shodh Utkarsh, 4(15), 38–39. https://doi.org/10.67275/t8vb2f34