नागार्जुन और त्रिलोचन के काव्य में शोषित वर्ग की आवाज और सामाजिक यथार्थ
DOI:
https://doi.org/10.67275/jkdq9k90Keywords:
नागार्जुन, त्रिलोचन, शोषित वर्ग, सामाजिक यथार्थ, प्रगतिशील कविता, जनपक्षधरता, लोकजीवन, , श्रम-संस्कृति।Abstract
हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के दो प्रमुख स्तंभों—नागार्जुन और त्रिलोचन—के काव्य में शोषित वर्ग की आवाज और सामाजिक यथार्थ का विस्तृत तुलनात्मक, विश्लेषणात्मक और समाजशास्त्रीय,अध्ययन किया गया है। आर्थिक विषमता, सामंती अवशेषों और नव-स्वाधीन राष्ट्र के मोहभंग से निर्मित होती है, जहाँ कृषक, मजदूर और उपेक्षित वर्ग निरंतर हाशिए पर धकेले जा रहे थे। दोनों कवि जनवादी है साथ ही उनके काव्य में किसान, भूमिहीन, ग्रामीण स्त्री और श्रमजीवी मनुष्य का जीवन-संघर्ष,काव्यात्मक शिल्प और संवेदना के साथ अभिव्यक्त हुआ है। अध्ययन-पद्धति के अंतर्गत वर्णनात्मक, विश्लेषणात्मक और तुलनात्मक विधाओं के साथ-साथ एक परिकल्पित कम्प्यूटेशनल रूपरेखा का भी उपयोग किया गया है। दोनों कवियों की जनपक्षधरता समान होने के बावजूद, नागार्जुन का स्वर जहाँ अधिक मुखर, व्यंग्यात्मक और राजनीतिक रूप से आक्रामक है, वहीं त्रिलोचन का काव्य शांत, आत्मीय, संवादपरक और मानवीय गरिमा को सहेजने वाला है। शोषित वर्ग और सामाजिक यथार्थ के चित्रण में यह भिन्नता उनके भाषिक प्रयोगों, बिंब-विधान और लोक-संवेदना में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। तुलनात्मक अध्ययन से यह प्रमुख निष्कर्ष प्राप्त होता है कि नागार्जुन की कविता व्यवस्था पर सीधा प्रहार करती है, जबकि त्रिलोचन की कविता शोषित मनुष्य के आत्मसम्मान और उसके श्रम की सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करते हुए गहरे और स्थायी प्रतिरोध का निर्माण करती है।







