उत्तर आधुनिक कविता की सौन्दर्य-दृष्टि
DOI:
https://doi.org/10.67275/wh61td12Keywords:
उत्तर आधुनिकता, हिन्दी कविता, सौन्दर्य-दृष्टि, विखंडन, बहुलता, अस्मिता, हाशिये का समाज, , लोक-संवेदना, उपभोक्तावाद।Abstract
उत्तर आधुनिक काल में समाज, राजनीति और संस्कृति में आए अभूतपूर्व बदलावों ने कविता के सौन्दर्यबोध को पूरी तरह से रूपांतरित कर दिया है। इस शोध-पत्र का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि किस प्रकार हाशिये का जीवन, विखंडित यथार्थ, अस्मितामूलक चेतना, और उपभोक्तावाद समकालीन कविता की नई सौन्दर्य-दृष्टि के आधार बने हैं। अध्ययन-पद्धति के रूप में इस शोध में एक प्रस्तावित विश्लेषणात्मक और व्याख्यात्मक ढाँचे का उपयोग किया गया है, जो सैद्धांतिक विमर्शों को कविता के संरचनात्मक और संवेदनागत पक्षों से जोड़ता है। उत्तर आधुनिक कविता की प्रमुख सौन्दर्यगत विशेषताओं में महावृत्तांतों का पतन, साधारण जीवन का उत्सव, सत्ता-विमर्श का विरोध और भाषा का लोकतंत्रीकरण शामिल हैं। अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष यह है कि उत्तर आधुनिक कविता ने सौन्दर्य को केवल रमणीयता और उदात्तता के संकुचित दायरे से बाहर निकालकर उसे जीवन की विसंगति, पीड़ा, संघर्ष और प्रतिरोध के साथ जोड़ दिया है। यह शोध स्थापित करता है कि समकालीन कविता का सौन्दर्य अब कृत्रिम सामंजस्य में नहीं, बल्कि यथार्थ की खुरदरी सच्चाइयों और बहुलतावादी स्वरों में निहित है।







